प्रवास, आशंका और पहाड़ की पीड़ा: क्या फिर लौटेगा वही संकट?

प्रवास, आशंका और पहाड़ की पीड़ा: क्या फिर लौटेगा वही संकट?
खबर शेयर करें:

 कृष्ण कुमार सेमवाल(वरिष्ठ पत्रकार)

प्रवास, आशंका और पहाड़ की पीड़ा: क्या फिर लौटेगा वही संकट?


उत्तराखंड के पहाड़ी अंचलों से रोज़गार की तलाश में देश के विभिन्न शहरों की ओर पलायन करने वाले प्रवासियों के मन में एक बार फिर चिंता की लहर उठने लगी है। हालात भले अभी सामान्य दिख रहे हों, लेकिन ऊर्जा संकट—विशेषकर गैस, पेट्रोल और डीज़ल की संभावित कमी—ने उनके मन में अनिश्चितता के बादल घुमड़ाने शुरू कर दिए हैं।

कोरोना काल की भयावह स्मृतियाँ अभी भी ताज़ा हैं। उस समय लाखों प्रवासी—दिल्ली, मुंबई, सूरत जैसे शहरों से—अपना सब कुछ छोड़कर वापस अपने गाँवों की ओर लौटने को मजबूर हुए थे। उस दौर ने सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक स्तर पर भी गहरे घाव दिए। आज फिर वैसी ही आशंका उनके भीतर सिर उठाने लगी है।

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के एक वक्तव्य—“कोरोना की तरह इस संकट को भी हम जीत लेंगे”—ने इन चिंताओं को और हवा दी है। इस कथन को लोग आने वाले किसी बड़े संकट की आहट के रूप में देख रहे हैं। भले ही सरकार का उद्देश्य जनता में विश्वास बनाए रखना हो, लेकिन प्रवासी वर्ग इसे संभावित कठिन समय की चेतावनी के रूप में भी ले रहा है।

सबसे बड़ी चिंता परिवहन व्यवस्था को लेकर है। यदि ईंधन संकट गहराता है, तो बसों और अन्य साधनों की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। कोरोना काल में जैसे-तैसे बसों और ट्रकों के सहारे लोग अपने गाँवों तक पहुँचे थे, लेकिन अगर इस बार वह विकल्प भी सीमित हुआ, तो पहाड़ के प्रवासियों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी हो जाएगी।

उत्तराखंड जैसे राज्य में यह संकट और गंभीर हो जाता है, क्योंकि यहाँ के अधिकांश पहाड़ी जिलों—जैसे पिथौरागढ़, बागेश्वर, चमोली, उत्तरकाशी, टिहरी—में अभी भी रेल संपर्क नहीं है। सड़क ही एकमात्र सहारा है। यदि वही बाधित हुआ, तो लाखों लोगों की वापसी लगभग असंभव हो सकती है।

आंकड़ों पर नज़र डालें तो स्थिति की गंभीरता और स्पष्ट होती है। अनुमानित रूप से:

पिथौरागढ़, बागेश्वर और चंपावत जैसे सीमांत जिलों से लगभग 60–70% युवा आबादी रोजगार के लिए बाहर है

चमोली, उत्तरकाशी और टिहरी में यह आंकड़ा 50–60% के आसपास है

अल्मोड़ा और नैनीताल जैसे जिलों से भी बड़ी संख्या में लोग दिल्ली-एनसीआर, पंजाब, महाराष्ट्र और गुजरात में कार्यरत हैं

कुल मिलाकर, उत्तराखंड के 10–15 लाख से अधिक प्रवासी देश के विभिन्न हिस्सों में आजीविका के लिए निर्भर हैं। ऐसे में किसी भी तरह का बड़ा संकट उनके जीवन को सीधे प्रभावित करता है।

लेकिन इस बार संकट सिर्फ यात्रा या वापसी तक सीमित नहीं है—शहरों में रह रहे प्रवासियों के रोजमर्रा के जीवन पर भी गहरा असर पड़ने की आशंका है।

किराये के मकानों में रहने वाले प्रवासियों के सामने खाना बनाने का संकट और भी गंभीर हो सकता है। गैस की कमी होने पर वे न तो लकड़ी जला सकते हैं, न ही कोयले का उपयोग कर सकते हैं। दूसरी ओर, बढ़ते पावर कट बिजली आधारित विकल्पों को भी सीमित कर रहे हैं।

यदि बाहर खाने की बात करें, तो कई छोटे होटल और ढाबे बंद होने की कगार पर हैं, और जो खुले हैं उनमें भी खाने के दाम लगातार बढ़ते जा रहे हैं। ऐसे में प्रवासियों के सामने रोज का भोजन भी एक चुनौती बन सकता है।

परिवहन पर संभावित प्रतिबंध इस संकट को और गहरा कर सकते हैं।

यदि बस, ऑटो-रिक्शा और टैक्सी सेवाओं पर रोक या सीमित संचालन लागू होता है, तो लाखों लोग अपने कार्यस्थल तक पहुँचने में असमर्थ हो सकते हैं। यहां तक कि निजी वाहनों के लिए भी यदि ईंधन सीमित कर दिया गया, तो लोग अपनी गाड़ी होने के बावजूद ऑफिस नहीं जा पाएंगे। इससे रोजगार पर सीधा असर पड़ेगा।

सूत्रों के अनुसार, केंद्र सरकार स्थिति की गंभीरता को देखते हुए राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ लगातार संपर्क में है और जल्द ही कोई बड़ा निर्णय लिया जा सकता है। यह निर्णय चाहे आपूर्ति प्रबंधन को लेकर हो या परिवहन व्यवस्था को लेकर—उसका असर सीधे आम जनता, खासकर प्रवासी वर्ग पर पड़ेगा।

आज उत्तराखंड का प्रवासी सिर्फ रोज़गार नहीं ढूंढ रहा, बल्कि अपने परिवार के भविष्य को सुरक्षित करने की कोशिश में घर से दूर है। लेकिन जब-जब संकट आता है, सबसे पहले उसी की ज़मीन खिसकती है।

जरूरत इस बात की है कि सरकारें समय रहते ठोस कदम उठाएँ—ईंधन की उपलब्धता सुनिश्चित करें, परिवहन व्यवस्था को मजबूत बनाएँ और प्रवासियों के लिए स्पष्ट और भरोसेमंद योजना प्रस्तुत करें—ताकि उन्हें फिर से अपने घरों की ओर मजबूरी में पलायन न करना पड़े।

क्योंकि हर बार पहाड़ लौटना सिर्फ घर वापसी नहीं होता,

बल्कि एक अधूरे सपने, टूटी उम्मीद और नई अनिश्चितता की शुरुआत भी होता है।

खबर पर प्रतिक्रिया दें 👇
खबर शेयर करें:

हमारे व्हाट्सएप्प ग्रुप से जुड़ें-

WhatsApp पर हमें खबरें भेजने व हमारी सभी खबरों को पढ़ने के लिए यहां लिंक पर क्लिक करें -

यहां क्लिक करें----->