बहुद्देशीय शिविर में प्रधान निर्मला राणा ने खोली स्वास्थ्य विभाग की पोल।

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बहुद्देशीय शिविर में प्रधान निर्मला राणा ने खोली स्वास्थ्य विभाग की पोल।

हिमाचल जाकर शर्मिंदा होना पड़ता है"— बहुद्देशीय शिविर में प्रधान निर्मला राणा ने खोली स्वास्थ्य विभाग की पोल।


आराकोट (उत्तरकाशी): उत्तराखंड सरकार के "सरकार जन-जन के द्वार" अभियान के तहत उत्तरकाशी जिले के अंतिम छोर पर स्थित आराकोट में आयोजित बहुद्देशीय शिविर में प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं की कड़वी सच्चाई सामने आई है। जिलाधिकारी प्रशांत आर्य की अध्यक्षता में आयोजित इस शिविर में आराकोट की ग्राम प्रधान निर्मला राणा ने अपनी बेबाक और तर्कपूर्ण बातों से व्यवस्था को आईना दिखाया।


ग्राम प्रधान निर्मला राणा ने डीएम के सामने अपनी व्यथा रखते हुए कहा कि कहने को आराकोट में पीएचसी (PHC) है, लेकिन इसकी हालत इतनी बदतर है कि मामूली सर्दी-जुकाम या पेट खराब होने पर भी ग्रामीणों को पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश के रोहडू या त्यूणी भागना पड़ता है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस क्षेत्र के कोटी गाड के 25 गांवों के ग्रामीणों के साथ स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर 'पशुओं से भी बदतर व्यवहार' किया जा रहा है।

निर्मला राणा ने भावुक होते हुए कहा, "जब हमें छोटी-छोटी बीमारियों के लिए हिमाचल के अस्पतालों में शरण लेनी पड़ती है, तो वहां हमें उत्तराखंडी होने के नाते शर्मिंदा होना पड़ता है।" उनका इशारा इस ओर था कि राज्य गठन के इतने वर्षों बाद भी उत्तराखंड अपनी सीमावर्ती जनता को बुनियादी इलाज तक नहीं दे पा रहा है।

शिविर में उपस्थित लोगों ने गौर किया कि प्रधान निर्मला राणा का हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर जबरदस्त अधिकार है। उनकी स्पष्टवादिता और शिक्षा का स्तर उच्च होने के बावजूद, वह व्यवस्था के नकारेपन के आगे खुद को लाचार महसूस कर रही हैं। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि एक योग्य जनप्रतिनिधि की यह स्थिति है, तो आम गरीब ग्रामीण का क्या हाल होगा?

आराकोट, जो मोरी ब्लॉक का अंतिम इलाका है और देहरादून के त्यूणी से जुड़ा है, अपनी भौगोलिक परिस्थितियों के कारण हमेशा से उपेक्षित रहा है। प्रधान निर्मला राणा की इस दहाड़ ने न केवल अधिकारियों को असहज किया, बल्कि यह संकेत भी दिया कि यदि जल्द ही स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार नहीं हुआ, तो क्षेत्र की जनता आंदोलन की राह पकड़ सकती है।


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