देहरादून में फिर हाथी का कहर: दूध लेकर घर लौट रही अंजली को कुचल डाला, अस्पताल में मौत; इंसानी जिंदगी पर भारी पड़ रही सरकारी लापरवाही !

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 देहरादून में फिर हाथी का कहर: दूध लेकर घर लौट रही अंजली को कुचल डाला, अस्पताल में मौत; इंसानी जिंदगी पर भारी पड़ रही सरकारी लापरवाही !

धन्याड़ी-बड़ासी ग्रांट में 40 वर्षीय महिला की मौत से दहशत, थानों वन रेंज में बढ़ते हाथी आतंक ने खोली वन विभाग की तैयारियों की पोल।


देहरादून। राजधानी देहरादून के डोईवाला क्षेत्र में एक बार फिर इंसान और वन्यजीव संघर्ष की भयावह तस्वीर सामने आई है। धन्याड़ी-बड़ासी ग्रांट में हाथी के हमले में गंभीर रूप से घायल हुई 40 वर्षीय अंजली गुप्ता ने अस्पताल में इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। घटना के बाद पूरे इलाके में दहशत का माहौल है और ग्रामीणों में वन विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर भारी नाराजगी दिखाई दे रही है।

जानकारी के अनुसार, सोमवार शाम करीब आठ बजे अंजली गुप्ता दूध लेकर अपने घर लौट रही थीं। इसी दौरान थानों वन रेंज क्षेत्र में हाथी ने उन पर हमला कर दिया। अचानक हुए हमले से अंजली गंभीर रूप से घायल हो गईं। स्थानीय लोगों की मदद से उन्हें तत्काल अस्पताल पहुंचाया गया, जहां चिकित्सकों ने उन्हें बचाने का प्रयास किया, लेकिन देर रात इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।

सवाल यह कि आखिर कब जागेगा सिस्टम?

अंजली की मौत ने वन विभाग और शासन की तैयारियों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस क्षेत्र में लगातार इंसानों और हाथियों के बीच टकराव की आशंका बनी रहती है, वहां आम लोगों की सुरक्षा के लिए क्या पर्याप्त गश्त, निगरानी और चेतावनी व्यवस्था मौजूद है?

ग्रामीणों का सवाल है कि जब वन विभाग को हाथियों की आवाजाही वाले संवेदनशील इलाकों की जानकारी रहती है, तो फिर आबादी वाले क्षेत्रों में लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए प्रभावी कदम क्यों नहीं उठाए जा रहे हैं?

एक महिला शाम के समय दूध लेकर घर लौट रही थी और रास्ते में हाथी ने उसकी जान ले ली। यह केवल एक वन्यजीव हमला नहीं, बल्कि उन व्यवस्थाओं पर भी सवाल है जिनका काम मानव-वन्यजीव संघर्ष वाले इलाकों में लोगों को सुरक्षित रखना है।

घटनाओं के बाद ही सक्रिय क्यों होता है विभाग?

पहाड़ और मैदानी इलाकों में हाथियों की आवाजाही कोई नई समस्या नहीं है। कई स्थानों पर हाथियों के आबादी में घुसने, खेतों को नुकसान पहुंचाने और लोगों पर हमले की घटनाएं सामने आती रही हैं। इसके बावजूद सवाल उठता है कि स्थायी समाधान के बजाय हर घटना के बाद वन विभाग की कार्रवाई तक व्यवस्था क्यों सीमित रह जाती है?

ग्रामीणों की मांग है कि संवेदनशील इलाकों में नियमित पेट्रोलिंग बढ़ाई जाए, हाथियों की गतिविधियों पर निगरानी रखी जाए और लोगों को समय रहते अलर्ट करने की प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए।

सरकार के सामने बड़ी चुनौती—इंसानों की सुरक्षा या सिर्फ कागजी इंतजाम?

अंजली गुप्ता की मौत के बाद अब सरकार और वन विभाग को यह स्पष्ट करना होगा कि मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए जमीन पर आखिर क्या ठोस व्यवस्था है। सिर्फ घटना के बाद मुआवजा, जांच और कार्रवाई का भरोसा देने से परिवार का नुकसान वापस नहीं हो सकता।

सरकार को यह भी बताना चाहिए कि हाथी प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा के लिए अब तक कितने प्रभावी कदम उठाए गए हैं, कितनी गश्त बढ़ाई गई और कितने संवेदनशील क्षेत्रों को चिन्हित कर सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की गई।

अंजली की मौत ने एक बार फिर वही सवाल खड़ा कर दिया है—क्या आम आदमी की जान जाने के बाद ही शासन-प्रशासन की नींद टूटेगी?

फिलहाल घटना के बाद वन विभाग की ओर से मामले में आगे की कार्रवाई की जा रही है। लेकिन क्षेत्र के लोगों की नजर अब इस बात पर है कि विभाग की कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित रहती है या वास्तव में हाथी-मानव संघर्ष रोकने के लिए जमीन पर ठोस कदम उठाए जाते हैं।

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