पीपलकोटी टनल में मौत का सुरंगनामा: 7 जिंदगियां गईं, अब जवाब दे सरकार और टीएचडीसी।
22 मजदूर फंसे, 19 बाहर निकले, 3 की तलाश जारी—डेढ़ किलोमीटर टनल में मलबा-पानी बना मौत का जाल; सुरक्षा इंतजामों पर उठे बड़े सवाल।
गोपेश्वर। पीपलकोटी के मायापुर में टीएचडीसी की निर्माणाधीन टनल में हुआ हादसा महज एक दुर्घटना नहीं, बल्कि पहाड़ में बड़े प्रोजेक्टों की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल बनकर सामने आया है। अब तक सात लोगों की मौत की सूचना है। 22 लोग टनल के भीतर फंसे थे, जिनमें से 19 को सुरक्षित बाहर निकाला जा चुका है, जबकि तीन की तलाश अभी भी जारी है।
रातभर मलबे और पानी के बीच जिंदगी और मौत की जंग चलती रही। एनडीआरएफ, एसडीआरएफ, आईटीबीपी, पुलिस और अन्य बचाव दल लगातार रेस्क्यू में जुटे हैं। लेकिन इस त्रासदी ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—आखिर निर्माणाधीन टनल में काम कर रहे मजदूरों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार व्यवस्था कहां थी?
सात मौतें... लेकिन जवाबदेही किसकी?
हादसे के बाद प्रशासन राहत और बचाव में जुटा है, जो जरूरी भी है। लेकिन अब सवाल सिर्फ रेस्क्यू का नहीं है। सवाल यह है कि जिस टनल में मजदूर काम कर रहे थे, वहां सुरक्षा के मानकों की निगरानी कौन कर रहा था?
टनल की कुल लंबाई करीब तीन किलोमीटर है और करीब 1.50 किलोमीटर हिस्से में भूधंसाव के कारण मलबा और पानी आने की स्थिति बनी। ऐसे में जांच का सबसे बड़ा बिंदु यही होना चाहिए कि क्या टनल के भीतर भूगर्भीय और जल संबंधी जोखिमों का पहले से आकलन किया गया था?
मजदूरों की जान परियोजना की कीमत नहीं हो सकती
बड़े प्रोजेक्टों की समयसीमा और निर्माण की रफ्तार अपनी जगह है, लेकिन मजदूरों की जिंदगी उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है।
टनल निर्माण में काम करने वाले श्रमिक सबसे जोखिम भरे वातावरण में काम करते हैं। ऐसे में आपातकालीन निकासी, निगरानी, संचार, पानी और मलबे की स्थिति से निपटने तथा लगातार सुरक्षा ऑडिट जैसी व्यवस्थाएं कितनी प्रभावी थीं—इसका जवाब अब टीएचडीसी और संबंधित एजेंसियों को देना होगा।
सरकार सिर्फ मौके पर पहुंचकर जिम्मेदारी पूरी न करे
हादसे के बाद अधिकारियों का मौके पर पहुंचना और रेस्क्यू अभियान की निगरानी करना जरूरी है, लेकिन सरकार की असली परीक्षा अब शुरू होती है।
सिर्फ राहत, उपचार और मुआवजे से सवाल खत्म नहीं होंगे। सरकार को सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि—
* हादसे की वास्तविक वजह क्या थी?टनल की सुरक्षा का अंतिम निरीक्षण कब हुआ था?क्या किसी सुरक्षा रिपोर्ट में खतरे की चेतावनी दी गई थी?टनल में आपातकालीन निकासी की क्या व्यवस्था थी?मजदूरों की सुरक्षा के लिए कौन-कौन से प्रोटोकॉल लागू थे?घटना के समय टनल में कितने लोग काम कर रहे थे?
सुरक्षा मानकों की निगरानी के लिए कौन अधिकारी या एजेंसी जिम्मेदार थी?
हादसे के लिए जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया कब शुरू होगी?
अब जांच ऐसी हो, जिसमें फाइलें नहीं, जिम्मेदारियां खुलें
पीपलकोटी हादसे की जांच सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। टनल की डिजाइन, भूगर्भीय रिपोर्ट, सुरक्षा ऑडिट, कार्यस्थल निरीक्षण, आपातकालीन व्यवस्था और परियोजना प्रबंधन की भूमिका—हर पहलू की जांच जरूरी है।
अगर कहीं लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। क्योंकि सात परिवारों के लिए यह महज एक सरकारी रिपोर्ट का आंकड़ा नहीं, बल्कि अपूरणीय क्षति है।
अब सरकार के सामने सबसे बड़ा सवाल
सुरंगें बनती रहेंगी, परियोजनाएं चलती रहेंगी और विकास भी जरूरी है—लेकिन क्या विकास की कीमत मजदूरों की जिंदगी होगी?
पीपलकोटी की सुरंग से निकली चीख अब सिर्फ मलबे में दबे तीन लोगों की तलाश की कहानी नहीं है। यह उत्तराखंड में सुरंग निर्माण की सुरक्षा व्यवस्था का आईना है।
अब रेस्क्यू के बाद जवाबदेही का रेस्क्यू भी जरूरी है—मलबे से नहीं, व्यवस्था की खामियों से।


