सात साल से पुल अधूरा, सरकार के विकास के दावे खोखले! 2019 में शुरू हुआ झींझी पुल आज भी अधर में, जनता को फिर मिला नवंबर का ‘लॉलीपॉप’।
**गोपेश्वर।** पहाड़ की जनता को बेहतर सड़क और मजबूत कनेक्टिविटी देने के सरकारी दावों की जमीनी हकीकत निजमुला घाटी में साफ दिखाई दे रही है। वर्ष 2019 से निर्माणाधीन झींझी मोटर पुल सात साल बाद भी पूरा नहीं हो पाया है। वर्षों से पुल निर्माण पूरा होने का इंतजार कर रहे ग्रामीणों को एक बार फिर नवंबर तक काम पूरा करने का आश्वासन दिया गया है।
सोमवार को गोपेश्वर में गढ़वाल कमिश्नर की अध्यक्षता में आयोजित जनता की समस्याओं से जुड़े कार्यक्रम में निजमुला घाटी के जनप्रतिनिधियों ने भाजपा चमोली के पूर्व जिलाध्यक्ष रघुबीर बिष्ट की अध्यक्षता में क्षेत्र की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया। इस दौरान झींझी पुल का मुद्दा सबसे अहम रहा।
खास बात यह है कि झींझी मोटर पुल और सड़क व्यवस्था का सवाल भाजपा के पूर्व जिलाध्यक्ष के क्षेत्र से भी जुड़ा है। इसके बावजूद वर्ष 2019 से पुल निर्माण पूरा न होना सरकार और संबंधित विभागों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। सवाल यह भी उठ रहा है कि जब वर्षों से प्रभावशाली जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के सामने यह मुद्दा उठता रहा, तो आम ग्रामीणों की परेशानी कब खत्म होगी?
जनप्रतिनिधियों ने कमिश्नर को बताया कि 2019 से पुल निर्माण चल रहा है, लेकिन सात साल गुजरने के बावजूद पुल जनता के इस्तेमाल के लिए तैयार नहीं हो सका। पुल की धीमी रफ्तार ने ग्रामीणों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। सवाल यह है कि आखिर एक पुल के निर्माण में इतना लंबा समय क्यों लग रहा है और इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
मामला सामने आने के बाद पीएमजीएसवाई के अधिकारियों ने नवंबर तक पुल का निर्माण पूरा करने का आश्वासन दिया। कमिश्नर ने भी जनप्रतिनिधियों को विभाग के इस आश्वासन से अवगत कराया।
लेकिन अब बड़ा सवाल यही है कि नवंबर की यह समयसीमा अंतिम होगी या फिर पहाड़ की जनता को एक बार फिर नई तारीख और नया आश्वासन थमा दिया जाएगा?
काली चट्टान का भूस्खलन भी बना मुसीबत
बिरही–निजमुला मोटर मार्ग पर काली चट्टान में पिछले वर्ष से लगातार हो रहे भूस्खलन ने करीब 12 गांवों की आवाजाही को संकट में डाल रखा है। यह सड़क निजमुला घाटी के गांवों को जोड़ने वाला प्रमुख मार्ग है, बावजूद इसके समस्या का स्थायी समाधान अब तक नहीं हो सका है।
जनप्रतिनिधियों ने गढ़वाल कमिश्नर के सामने सवाल उठाते हुए कहा कि बार-बार भूस्खलन होने के बावजूद इस संवेदनशील स्थान का स्थायी समाधान क्यों नहीं किया जा रहा है। कमिश्नर ने तत्काल पीडब्ल्यूडी के अधिशासी अभियंता तनुज कांबोज से जानकारी लेते हुए मामले की रिपोर्ट शासन को भेजने के निर्देश दिए।
झींझी पुल से पाना तक सड़क बंद, ग्रामीणों की परेशानी बढ़ी
जनप्रतिनिधियों ने झींझी पुल से पाना गांव तक बंद पड़े मोटर मार्ग को भी तत्काल खुलवाने की मांग की। इस पर गढ़वाल कमिश्नर ने पीएमजीएसवाई को मार्ग खोलने के निर्देश दिए।
सरकार से जनता का सीधा सवाल—आखिर कब खत्म होगा इंतजार?
निजमुला घाटी के ग्रामीणों का कहना है कि पहाड़ों में सड़क और पुल केवल विकास की परियोजनाएं नहीं, बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी की बुनियादी जरूरत हैं। सात साल तक पुल अधूरा पड़ा रहना सिस्टम की गंभीर कार्यशैली पर सवाल खड़ा करता है।
सरकार लगातार प्रदेश में सड़क, पुल और कनेक्टिविटी के विकास के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन निजमुला घाटी का झींझी पुल उन दावों की जमीनी तस्वीर दिखा रहा है। ग्रामीणों को अब भाषण और आश्वासन नहीं, बल्कि पुल पर आवाजाही चाहिए।
सवालों के घेरे में सात साल की सरकारी कार्यप्रणाली
झींझी पुल का वर्ष 2019 से निर्माणाधीन रहना सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि एक पुल के निर्माण में सात साल लग जाएं तो पहाड़ी क्षेत्रों में विकास और बेहतर कनेक्टिविटी के सरकारी दावों की हकीकत आसानी से समझी जा सकती है। अब नवंबर की नई समयसीमा पर ग्रामीणों की नजर है—देखना होगा कि इस बार आश्वासन हकीकत में बदलता है या फिर एक बार फिर तारीख आगे बढ़ती है।
अब देखना होगा कि नवंबर तक झींझी पुल वास्तव में तैयार होता है या फिर सरकार और विभाग की समयसीमा एक बार फिर कागजों तक सिमटकर रह जाती है।
ज्ञापन देने वालों में प्रधान संगठन के पूर्व जिलाध्यक्ष **मोहन नेगी**, महेंद्र नेगी, क्षेत्र पंचायत सदस्य **सीमा नेगी**, ग्राम प्रधान पाना **राजीव कुमार**, ग्राम प्रधान झींझी **मोहन नेगी**, पूर्व ग्राम प्रधान **लक्ष्मण खाती**, क्षेत्र पंचायत सदस्य **कर्ण सिंह**, ग्राम प्रधान मोली **भगत सिंह**, ब्यारा के पूर्व प्रधान **बृज कुमार**, कान सिंह बिष्ट, भरत राणा सहित अनेक जनप्रतिनिधि मौजूद थे।



