सरकार के खेल विकास के दावे फेल! गुलाबराय मैदान में प्रतिभा नहीं, बदहाली दौड़ रही।

सरकार के खेल विकास के दावे फेल! गुलाबराय मैदान में प्रतिभा नहीं, बदहाली दौड़ रही।
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सरकार के खेल विकास के दावे फेल! गुलाबराय मैदान में प्रतिभा नहीं, बदहाली दौड़ रही।

रुद्रप्रयाग के खिलाड़ियों का सवाल—मेडल और नाम की उम्मीद है तो मैदान और सुविधाएं देने में सरकार क्यों पीछे?



रुद्रप्रयाग। सरकार मंचों से खेल प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने, युवाओं को अवसर देने और प्रदेश को खेलों में नई पहचान दिलाने के दावे करती है, लेकिन रुद्रप्रयाग के गुलाबराय मैदान में अभ्यास कर रहे बच्चों की स्थिति इन दावों की जमीनी हकीकत पर बड़ा सवाल खड़ा कर रही है।

फुटबॉल, क्रिकेट समेत अलग-अलग खेलों में अपना भविष्य तलाश रहे बच्चों के पास प्रतिभा है, मेहनत है और कुछ कर गुजरने का जज्बा है, लेकिन बेहतर सुविधाओं का इंतजार अब भी खत्म नहीं हुआ। बच्चे साफ कह रहे हैं कि उन्हें ऐसे मैदान और संसाधन चाहिए, जहां वे अपनी क्षमता को सही दिशा दे सकें।

‘सुविधा नहीं तो प्रतिभा कैसे निकलेगी?’

बच्चों का कहना है कि प्रदेश के कई स्थानों पर खिलाड़ियों को बेहतर मैदान, प्रशिक्षण और खेल सुविधाएं मिल रही हैं। वहां के खिलाड़ी आगे बढ़ रहे हैं, प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले रहे हैं और जिले-प्रदेश का नाम रोशन कर रहे हैं। लेकिन रुद्रप्रयाग के खिलाड़ियों को आखिर कब वह मौका मिलेगा, जिसके वे हकदार हैं?

यह सवाल सिर्फ बच्चों का नहीं, बल्कि रुद्रप्रयाग के खेल भविष्य का सवाल है।

सरकारी दावे मैदान में क्यों नहीं दिखते?

खेल प्रतिभाओं को प्रोत्साहन देने की बातें हर स्तर पर होती हैं। योजनाओं और घोषणाओं की कमी नहीं है। लेकिन जब बच्चे खुद सामने आकर बेहतर मैदान और सुविधाओं की मांग करने लगें, तो जिम्मेदारों से सवाल पूछा जाना स्वाभाविक है कि कागजों पर खेल विकास और मैदान पर खिलाड़ियों की परेशानी के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों है?

क्या खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएं देने के लिए किसी बड़ी उपलब्धि का इंतजार किया जाएगा?
क्या छोटे शहर और पहाड़ी जिलों के बच्चों को भी बड़े मैदानों जैसी सुविधाएं नहीं मिलनी चाहिए?

बच्चों की मांग में कोई बड़ी सुविधा या विशेषाधिकार नहीं, बल्कि बेहतर मैदान, प्रशिक्षण और आवश्यक खेल संसाधन शामिल हैं।

प्रतिभा को मौका नहीं मिला तो जिम्मेदारी किसकी?

रुद्रप्रयाग के इन बच्चों में आगे बढ़ने का सपना है। वे खेल के जरिए अपने जिले, उत्तराखंड और देश का नाम रोशन करना चाहते हैं। लेकिन प्रतिभा केवल सपनों से नहीं, सही प्रशिक्षण और सुविधाओं से निखरती है।

अगर आज इन बच्चों की आवाज नहीं सुनी गई तो कल जब प्रतिभाएं दूसरे क्षेत्रों की ओर अवसर तलाशने को मजबूर होंगी, तब जिम्मेदारी किसकी होगी?

सरकार और जिम्मेदार विभाग को अब भाषण नहीं, जवाब देना चाहिए—गुलाबराय मैदान के खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएं आखिर कब मिलेंगी?

बच्चों का संदेश साफ—वादे नहीं, मैदान पर काम चाहिए!

गुलाबराय मैदान में उठी यह आवाज महज कुछ बच्चों की मांग नहीं है। यह उस पूरे युवा वर्ग की आवाज है जो खेल में अपना भविष्य बनाना चाहता है। अब फैसला जिम्मेदारों को करना है—इन बच्चों के सपनों को सुविधा मिलेगी या फिर वे भी सरकारी आश्वासनों की फाइलों में दबकर रह जाएंगे।

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