मोहनखाल-कंतोली-चोपता सड़क पर फिर आंदोलन की आग, दो साल बाद भी सरकार के वादे अधूरे!
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के गांव-इलाके की सड़क भी नहीं बन पाई—पूर्व विधायक मनोज रावत ने सरकार से पूछे सीधे सवाल
**रुद्रप्रयाग।** मोहनखाल-कंतोली-चोपता मोटर मार्ग को लेकर एक बार फिर आंदोलन शुरू हो गया है। करीब दो साल पहले हुए आंदोलन और उसके बाद सरकार की ओर से किए गए दावों के बावजूद सड़क का मामला आज भी फाइलों में अटका नजर आ रहा है। ऐसे में अब सवाल उठ रहा है कि आखिर 2024 के आंदोलन के बाद इन दो वर्षों में जमीन पर हुआ क्या?
पूर्व विधायक केदारनाथ मनोज रावत ने सड़क निर्माण को लेकर सरकार, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट, क्षेत्रीय विधायक की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि 1970 में केदारनाथ वन प्रभाग ने इस मार्ग पर करीब 12 किलोमीटर सड़क तैयार की थी। तत्कालीन पूर्व मंत्री नरेंद्र सिंह भंडारी और तत्कालीन डीएफओ बाड़व के नेगी के योगदान से सड़क का निर्माण संभव हुआ था।
रावत के अनुसार, लंबे समय तक देखरेख के अभाव के बावजूद वर्ष 1970 से यह सड़क केवल एक स्थान पर क्षतिग्रस्त हुई थी। विधायक रहते हुए उन्होंने विधायक निधि से रुद्रप्रयाग वन विभाग को धन उपलब्ध कराकर उस हिस्से को खुलवाया था।
2024 में आंदोलन हुआ, समर्थन मिला, फिर दो साल में क्या हुआ?
रावत ने कहा कि वर्ष 2024 में सड़क को लेकर आंदोलन हुआ था। उन्होंने भी आंदोलन को समर्थन दिया था। केदारनाथ उपचुनाव से पहले मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के साथ अगस्त्यमुनि में तस्वीरें भी सामने आई थीं और सड़क को लेकर उम्मीदें जगी थीं। लेकिन अब दो साल गुजरने के बाद भी स्थिति जस की तस है।
उन्होंने सरकार से सवाल किया कि मुख्यमंत्री की घोषणा का क्या हुआ? यदि घोषणा के बाद कोई शासनादेश जारी हुआ है तो उसे सार्वजनिक किया जाए। सिर्फ घोषणा और शासनादेश से आगे बढ़कर असली सवाल वन भूमि हस्तांतरण का है। आखिर यह मामला किस स्तर पर अटका हुआ है, इसकी जानकारी जनता को क्यों नहीं दी जा रही?
रिजर्व फॉरेस्ट और अभयारण्य क्षेत्र का पेच, संयुक्त निरीक्षण हुआ तो रिपोर्ट कहां?
मोहनखाल-कंतोली-चोपता सड़क का कुछ हिस्सा रिजर्व फॉरेस्ट और कुछ हिस्सा अभयारण्य क्षेत्र में बताया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या संबंधित विभागों का संयुक्त निरीक्षण हुआ? यदि हुआ है तो उसकी रिपोर्ट और पत्राचार सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?
रावत ने कहा कि जनता को सिर्फ कागजों और घोषणाओं की जानकारी नहीं चाहिए, बल्कि यह जानना है कि जमीन पर इन दो वर्षों में क्या कार्रवाई हुई और फाइल आखिर कहां अटकी है।
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के गांव-इलाके का मामला, फिर भी सड़क के लिए क्यों नहीं खुला रास्ता?
इस सड़क को लेकर राजनीतिक सवाल भी अब तेज हो गए हैं। रावत ने कहा कि यह कोई सामान्य सड़क का मामला नहीं है। यह क्षेत्र भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के गांव-इलाके से भी जुड़ा हुआ है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब प्रदेश और केंद्र में भाजपा की सरकार है और इसे डबल इंजन सरकार कहा जाता है, तो फिर वर्षों पुरानी इस सड़क की अड़चन दूर क्यों नहीं हो पा रही है?
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के प्रभाव वाले क्षेत्र में ही यदि करीब सात किलोमीटर अभयारण्य क्षेत्र में सड़क की स्वीकृति नहीं हो पा रही, तो सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठना लाजिमी है।
सेंचुरी एरिया में सड़क नहीं बन सकती—यह तर्क भी सवालों के घेरे में।
पूर्व विधायक ने उस दलील पर भी सवाल उठाया कि अभयारण्य क्षेत्र में सड़क स्वीकृत नहीं हो सकती। उन्होंने दावा किया कि उनके विधायक रहते केदारनाथ विधानसभा क्षेत्र की पांच सड़कें अभयारण्य क्षेत्र में स्वीकृत हुई थीं और ये सभी केदारनाथ वन प्रभाग के अंतर्गत आती थीं।
उनका कहना है कि यदि पहले ऐसे मामलों में रास्ता निकाला जा सकता था तो अब मोहनखाल-कंतोली-चोपता सड़क के लिए रास्ता क्यों नहीं निकाला जा रहा?
अब जनता के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है—
2024 के आंदोलन के बाद दो साल में क्या हुआ?
**मुख्यमंत्री की घोषणा कहां गई?**
**शासनादेश हुआ तो उसकी प्रति कहां है?**
**वन भूमि हस्तांतरण की फाइल किस विभाग या अधिकारी के पास अटकी है?**
**संयुक्त निरीक्षण हुआ तो उसकी रिपोर्ट कहां है?**
और सबसे बड़ा सवाल—
भाजपा सरकार, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और क्षेत्रीय जनप्रतिनिधियों के प्रभाव वाले इलाके में भी यदि एक सड़क नहीं बन पा रही, तो फिर ‘डबल इंजन’ सरकार के विकास के दावों का क्या मतलब है?
मोहनखाल-कंतोली-चोपता सड़क अब सिर्फ सड़क का मुद्दा नहीं रह गई है। यह सरकारी घोषणाओं, राजनीतिक इच्छाशक्ति और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही की परीक्षा बन चुकी है। आंदोलन दोबारा शुरू होने के बाद अब निगाहें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं
मोहनखाल-कंतोली-चोपता मोटर मार्ग का मुद्दा अब महज सड़क निर्माण तक सीमित नहीं रह गया है। लंबे समय से सड़क की बदहाल स्थिति और निर्माण की मांग को लेकर क्षेत्रवासियों का आंदोलन तेज हो गया है। सड़क को लेकर स्थानीय लोगों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है और अब ग्रामीणों ने धरना देकर जिम्मेदार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों से तत्काल कार्रवाई की मांग उठाई है।
धरने में अध्यक्ष राकेश नेगी, उपाध्यक्ष राजीव सिंह नेगी, व्यापार संघ अध्यक्ष धर्मेंद्र सिंह बिष्ट, देवी प्रसाद थपलियाल, डॉ. रमेश चंद्र थपलियाल, अमर सिंह बिष्ट, ओमप्रकाश नेगी, वासुदेव सिंह, अमरीश प्रसाद, हरि सिंह, दिनेश, जीतपाल बिष्ट और किशोर सिंह सहित क्षेत्रवासी शामिल रहे।
धरने पर बैठे लोगों का कहना है कि मोहनखाल-कंतोली-चोपता सड़क क्षेत्र की जीवनरेखा है, लेकिन लंबे समय से सड़क की समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो पाया है। सड़क की बदहाली के कारण स्थानीय ग्रामीणों, व्यापारियों और वाहन चालकों को लगातार परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
क्षेत्रवासियों ने स्पष्ट किया कि अब केवल आश्वासन से काम नहीं चलेगा। सड़क के निर्माण और सुधार को लेकर ठोस कार्रवाई और समयबद्ध समाधान चाहिए। आंदोलनकारियों ने चेतावनी दी कि यदि उनकी मांगों पर शीघ्र कार्रवाई नहीं हुई तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा।
धरने को समस्त क्षेत्रवासियों ने समर्थन दिया और सड़क की मांग को लेकर एकजुटता दिखाई।





