रेलवे विकास की बलि चढ़ा उत्तराखंड का शिवानंदी गांव।
सुरंग निर्माण से सूखे जलस्रोत, मकानों में आईं दरारें।
अलकनंदा से पानी ढोने को मजबूर ग्रामीण।
रुद्रप्रयाग: उत्तराखंड के पहाड़ों में 'विकास' के नाम पर विनाश का खेल थमने का नाम नहीं ले रहा है। ताजा मामला रुद्रप्रयाग जनपद के ग्राम सभा शिवानंदी से सामने आया है, जहाँ रेलवे सुरंग निर्माण कार्य ग्रामीणों के लिए अभिशाप बन चुका है। सुरंग खोदे जाने के कारण गांव के वर्षों पुराने प्राकृतिक जलस्रोत पूरी तरह सूख चुके हैं, जिससे पूरा इलाका बूंद-बूंद पानी के लिए तरस गया है।
समस्या से बुरी तरह त्रस्त और आक्रोशित ग्रामीणों ने बृहस्पतिवार को खाली बर्तन लेकर पेयजल टैंकों पर धावा बोल दिया और प्रशासन व निर्माण एजेंसी के खिलाफ जोरदार प्रदर्शन करते हुए उग्र आंदोलन की खुली चेतावनी दी।
ग्रामीणों ने बेहद आक्रोशित स्वर में आरोप लगाया कि जिस प्राकृतिक स्रोत से दशकों से पूरे गांव की प्यास बुझती थी और पेयजल व्यवस्था सुचारू रूप से संचालित होती थी, वह रेलवे सुरंग के निर्माण के बाद अचानक पाताल में समा गया। इस लापरवाही का खमियाजा अब गांव के मासूम बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं को भुगतना पड़ रहा है। भीषण जल संकट के बीच, महिलाओं को अपनी जान जोखिम में डालकर रोजाना करीब आधा किलोमीटर दूर अलकनंदा नदी की गहराई में उतरना पड़ रहा है, जहाँ से वे सिर पर पानी ढोकर घरों की जरूरतें पूरी करने को मजबूर हैं।
ग्रामीणों का दर्द सिर्फ पानी के संकट तक ही सीमित नहीं है; रेलवे सुरंग के अनियंत्रित निर्माण ने उनके आशियानों की नींव को भी हिलाकर रख दिया है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि सुरंग के भीतर की जा रही ब्लास्टिंग और खुदाई के चलते गांव के कई मकानों में भयानक और जानलेवा दरारें पड़ने लगी हैं। स्थिति यह हो गई है कि लोग अपने ही घरों में सोने से डर रहे हैं। एक ओर सिर छुपाने की छत असुरक्षित हो रही है, तो दूसरी ओर जीवनदायिनी जलधाराएं भी दम तोड़ चुकी हैं, जिसने पूरे शिवानंदी गांव के भविष्य को अंधकार में धकेल दिया है।
इस गंभीर मानवीय और पर्यावरणीय संकट पर निर्माण एजेंसी और स्थानीय प्रशासन ने पूरी तरह से आंखें मूंद रखी हैं। बार-बार गुहार लगाने के बाद भी ग्रामीणों को सिर्फ कोरे आश्वासन ही मिले हैं। बृहस्पतिवार को पेयजल टैंकों पर फूटे ग्रामीणों के गुस्से ने यह साफ कर दिया है कि अब पानी सिर से ऊपर निकल चुका है। आक्रोशित जनता का साफ कहना है कि यदि प्रशासन ने तुरंत वैकल्पिक पेयजल व्यवस्था नहीं की और मकानों के नुकसान का मुआवजा तय नहीं किया, तो वे चक्का जाम और उग्र आंदोलन के लिए सड़कों पर उतरने को विवश होंगे, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।


