पहली ही बरसात में उखड़ा ₹12,000 करोड़ का दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे।

पहली ही बरसात में उखड़ा ₹12,000 करोड़ का दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे।
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पहली ही बरसात में उखड़ा ₹12,000 करोड़ का दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे।

दावे 'वर्ल्ड क्लास' के, हकीकत में 'गड्ढा क्लास'।

 जनता पूछ रही– "जवाबदेह कौन?"



देहरादून: देश के बुनियादी ढांचे (Infrastructure) के विकास और "विश्वस्तरीय" सड़कों के बड़े-बड़े दावों की पोल एक बार फिर खुल गई है। The Economic Times की रिपोर्ट के अनुसार, भारी-भरकम ₹12,000 करोड़ की लागत से बनकर तैयार हुआ छह लेन का दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे मानसून की पहली ही जोरदार बारिश भी नहीं झेल पाया। जनता के टैक्स के पैसों से बनी इस चमचमाती सड़क की गुणवत्ता उद्घाटन के महज कुछ ही हफ्तों (79 दिनों) के भीतर ताश के पत्तों की तरह ढहती नजर आ रही है। 

सड़क पर जगह-जगह हुए जानलेवा गड्ढे और क्षतिग्रस्त हिस्से अब चीख-चीखकर निर्माण कार्य में हुई लापरवाही और कथित भ्रष्टाचार की गवाही दे रहे हैं। 

गौरतलब है कि बीते 14 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बड़े तामझाम के साथ इस एक्सप्रेसवे का उद्घाटन किया था। दावा किया गया था कि यह एक्सप्रेसवे दिल्ली से देहरादून के सफर को बेहद सुगम और सुरक्षित बना देगा। मगर हकीकत यह है कि उद्घाटन के 90 दिन भी पूरे होने से पहले ही यह एक्सप्रेसवे 'एक्सीडेंट ज़ोन' में तब्दील हो चुका है। सोशल मीडिया पर इस एक्सप्रेसवे के कई वीडियो तेजी से वायरल हो रहे हैं, जिसमें सड़क के बीचो-बीच बड़े-बड़े और गहरे गड्ढे साफ देखे जा सकते है।

इंटरनेट पर वायरल वीडियो में वाहन चालक अपनी गाड़ियों को हुए भारी नुकसान का दर्द बयां कर रहे हैं। एक यात्री ने अपनी गाड़ी का मुड़ा हुआ अलॉय व्हील दिखाते हुए बताया कि सड़क के बीच अचानक आए गहरे गड्ढे के कारण कई गाड़ियां अनियंत्रित होकर हादसे का शिकार होने से बाल-बाल बची हैं। 

100 किमी/घंटा की रफ्तार से चलने वाले इस एक्सप्रेसवे पर ये गड्ढे किसी बड़े और जानलेवा हादसे को खुला आमंत्रण दे रहे हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि सड़क पर आम लोगों को खड़े होकर पीछे से आ रहे वाहनों को धीरे करने का इशारा करना पड़ रहा है। 

सड़क की इस बदहाली ने सरकार के तथाकथित विकास मॉडल पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। विपक्ष और आम जनता सोशल मीडिया पर सरकार को आड़े हाथों ले रही है। 

जनता पूछ रही है कि क्या ₹12,000 करोड़ रुपये सिर्फ कागजी दावों और विज्ञापनों के लिए थे? 

पहली ही बारिश में उखड़ने वाली इस सड़क को 'वर्ल्ड क्लास' का सर्टिफिकेट किस आधार पर दिया गया?

घटिया निर्माण सामग्री का इस्तेमाल करने वाले ठेकेदारों और अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी? 

सड़क पर सफर कर रहे नागरिकों का कहना है कि सरकारें टोल वसूलने में तो एक मिनट की भी देरी नहीं करतीं, लेकिन जब बात सुरक्षा और गुणवत्ता की आती है, तो हाथ खड़े कर दिए जाते हैं। अब देखना यह है कि इस गंभीर लापरवाही की जवाबदेही कौन तय करेगा या फिर हर बार की तरह इस बार भी इस लीपापोती को 'अत्यधिक बारिश' का बहाना बनाकर दबा दिया जाएगा। 

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