आजादी के 79 साल बाद भी सड़क को तरस रहा गांव, घायल ग्रामीण को 6 किमी डोली में ढोना पड़ा!

आजादी के 79 साल बाद भी सड़क को तरस रहा गांव, घायल ग्रामीण को 6 किमी डोली में ढोना पड़ा!
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आजादी के 79 साल बाद भी सड़क को तरस रहा गांव, घायल ग्रामीण को 6 किमी डोली में ढोना पड़ा!

विकास के दावों पर साला रज्यूड़ा की हकीकत ने खड़े किए सवाल।


**पाटी (चंपावत)।** देश आजादी के 79 साल पूरे होने का जश्न मनाने जा रहा है। सरकारें गांव-गांव तक सड़क, स्वास्थ्य और मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने के दावे करती हैं, लेकिन पहाड़ के कई गांवों की हकीकत इन दावों से बिल्कुल अलग तस्वीर पेश कर रही है। चंपावत के पाटी ब्लॉक स्थित ग्राम पंचायत गागर के तोक साला रज्यूड़ा में आज भी ग्रामीण सड़क सुविधा से महरूम हैं।

हालात इतने गंभीर हैं कि किसी ग्रामीण के घायल होने पर उसे अस्पताल तक पहुंचाने के लिए आज भी डोली का सहारा लेना पड़ रहा है। रविवार सुबह हुई एक घटना ने सरकारी विकास के दावों की जमीनी हकीकत सामने ला दी।

जानकारी के अनुसार रविवार, 9 अगस्त को सुबह करीब 6:30 बजे साला रज्यूड़ा निवासी कैलाश भट्ट पुत्र पूर्णानंद भट्ट मवेशियों को खेतों में चारा चुगाने ले जा रहे थे। इसी दौरान एक बैल ने अचानक उन पर हमला कर दिया। बैल के सींग लगने से कैलाश के पैर में गंभीर चोट आई और काफी रक्तस्राव होने लगा।

घायल कैलाश को अस्पताल तक पहुंचाने के लिए ग्रामीणों ने कुर्सी की डोली तैयार की। इसके बाद ग्रामीणों ने करीब 6 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई पार कर उन्हें सड़क तक पहुंचाया। गर्मी और कठिन पहाड़ी रास्ते के बीच ग्रामीण बारी-बारी से डोली को कंधा देते रहे। सड़क तक पहुंचने के बाद निजी वाहन से घायल को उपचार के लिए हल्द्वानी रेफर किया गया।

दो कार्यकाल बाद भी सड़क नहीं, सवालों के घेरे में विकास

यह घटना केवल एक घायल ग्रामीण को डोली से सड़क तक पहुंचाने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था पर सवाल है जो आजादी के 79 साल बाद भी ग्रामीणों को सड़क जैसी बुनियादी सुविधा नहीं दे पाई।

उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व वाली सरकार के दो कार्यकाल पूरे होने के बावजूद अगर ग्रामीणों को आपात स्थिति में 6 किलोमीटर पैदल चढ़ाई पार कर डोली से सड़क तक पहुंचना पड़ रहा है, तो सरकार के ग्रामीण विकास और सड़क कनेक्टिविटी के दावों पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

सड़क नहीं तो विकास किसके लिए?

साला रज्यूड़ा के ग्रामीणों की समस्या सिर्फ सड़क तक सीमित नहीं है। सड़क सुविधा के अभाव में ग्रामीणों को रोजमर्रा के काम, स्वास्थ्य सेवाओं और अन्य जरूरी सुविधाओं के लिए भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। रोजगार और बेहतर सुविधाओं की तलाश में ग्रामीणों के पलायन की स्थिति भी सामने आ रही है।

सवाल यह है कि **जब किसी घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचाने में 6 किलोमीटर की पहाड़ी चढ़ाई पार करनी पड़े, तो आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था और ग्रामीण विकास के सरकारी दावों की जमीनी स्थिति क्या है?**

**आजादी के 79 साल बाद भी अगर पहाड़ का ग्रामीण सड़क के लिए तरस रहा है, तो यह सिर्फ एक गांव की समस्या नहीं, बल्कि पहाड़ के विकास मॉडल पर गंभीर सवाल है।**


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