मॉडल जिले के दावों की खुली पोल! बकोड़ा में सड़क नहीं, घायल किसान को कंधों पर ढोते रहे ग्रामीण।

मॉडल जिले के दावों की खुली पोल! बकोड़ा में सड़क नहीं, घायल किसान को कंधों पर ढोते रहे ग्रामीण।
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मॉडल जिले के दावों की खुली पोल! बकोड़ा में सड़क नहीं, घायल किसान को कंधों पर ढोते रहे ग्रामीण।


चंपावत। एक तरफ चंपावत को मॉडल जिला बनाने और गांव-गांव विकास पहुंचाने के दावे किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ दूरस्थ ग्राम पंचायत बकोड़ा की तस्वीर इन दावों को आईना दिखा रही है। गांव तक सड़क नहीं पहुंचने से एक घायल किसान को इलाज के लिए ग्रामीणों ने कंधों और डंडों के सहारे पैदल रास्ते से मोटर मार्ग तक पहुंचाया। इसके बाद उसे टनकपुर अस्पताल ले जाया गया।

यह तस्वीर सवाल पूछ रही है कि आखिर किस विकास मॉडल की बात हो रही है, जहां बीमार और घायल व्यक्ति को अस्पताल पहुंचने से पहले पहाड़ की पगडंडियों और ग्रामीणों के कंधों पर निर्भर रहना पड़ता है?

सरकार की फाइलें दौड़ रही हैं, लेकिन सड़क नहीं!

ग्रामीण लंबे समय से सड़क की मांग कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि सड़क की DPR तैयार कर केंद्र सरकार को भेजी जा चुकी है। अधिकारी कागजों पर प्रक्रिया आगे बढ़ने की बात कर रहे हैं, लेकिन बकोड़ा की जमीन पर हालात जस के तस हैं।

DPR बन गई, प्रस्ताव चला गया, लेकिन सड़क कब बनेगी—इसका जवाब ग्रामीणों को आज तक नहीं मिला।

सरकारी फाइलों में सड़क की लंबाई और लागत तय हो सकती है, लेकिन गांव के घायल किसान के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि एम्बुलेंस गांव तक कब पहुंचेगी?

आज किसान, कल मरीज या गर्भवती महिला?

बकोड़ा की समस्या सिर्फ सड़क की नहीं है। सड़क न होने का सीधा असर ग्रामीणों की जिंदगी और सुरक्षा पर पड़ रहा है। किसी गंभीर मरीज, गर्भवती महिला, बुजुर्ग या घायल को अस्पताल पहुंचाने के लिए पहले उसे पैदल रास्ते से मोटर मार्ग तक लाना पड़ता है।

ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है—अगर आधी रात किसी की तबीयत बिगड़ जाए तो क्या सरकार की योजनाएं उसे अस्पताल तक पहुंचाएंगी या फिर ग्रामीणों के कंधे ही सहारा बनेंगे?

पलायन बढ़ रहा, जिम्मेदारी कौन लेगा?

ग्राम प्रधान रविंद्र सिंह रावत के अनुसार सड़क के अभाव में गांव से पलायन भी बढ़ रहा है। यानी सड़क की कमी केवल आवागमन की समस्या नहीं, बल्कि गांव के भविष्य पर भी असर डाल रही है।

जब गांव में सड़क, स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं पहुंचेंगी तो ग्रामीण आखिर कब तक यहां टिके रहेंगे?

सरकार पलायन रोकने की बात करती है, लेकिन क्या बिना सड़क के गांवों को आबाद रखने की उम्मीद की जा सकती है?

मॉडल जिला या कागजी मॉडल?

बकोड़ा की तस्वीर सरकार के सामने सीधा सवाल खड़ा करती है—क्या विकास सिर्फ जिला मुख्यालय और कागजों तक सीमित है?

एक ओर मॉडल जिले की घोषणाएं और दूसरी ओर घायल को कंधों पर ढोते ग्रामीण। यह विरोधाभास सरकारी दावों की गंभीरता पर सवाल खड़ा करता है।

ग्रामीणों को अब घोषणा नहीं, सड़क चाहिए। DPR नहीं, धरातल पर काम चाहिए। आश्वासन नहीं, एंबुलेंस पहुंचने लायक रास्ता चाहिए।


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