एक साल बाद भी मलबे में दबा छेनागाड़!
आपदा के जख्म नहीं भरे, बाजार नहीं बसा, घोषणाएं फाइलों में कैद—प्रभावित पूछ रहे: आखिर कब जागेगी सरकार?
15 से ज्यादा दुकान-मकान तबाह, आठ जिंदगियां चंदन नदी में समाईं; आज भी राहत, पुनर्वास और कारोबार की वापसी का इंतजार।
एक साल गुजर गया, लेकिन सवाल आज भी वहीं खड़ा है—क्या छेनागाड़ को सिर्फ आपदा के बाद आश्वासन ही मिला?
जिस बाजार में कभी छह-सात ग्राम सभाओं के लोग खरीदारी के लिए पहुंचते थे, वहां आज उजड़ी जिंदगी और आपदा के निशान सरकार के दावों पर सवाल खड़े कर रहे हैं।
घोषणाओं की चमक फीकी, जमीन पर हालात जस के तस!
आपदा के बाद राहत और पुनर्वास को लेकर प्रभावितों को उम्मीद बंधी थी। मुख्यमंत्री के दौरे के दौरान भी मदद और पुनर्वास का भरोसा मिला। लेकिन एक साल बाद प्रभावित परिवारों की शिकायतें बताती हैं कि उम्मीद और हकीकत के बीच की दूरी अभी खत्म नहीं हुई।
जिन परिवारों ने घर और दुकानें खोईं, उनके सामने आज भी भविष्य का सवाल है। कारोबार उजड़ने से मेडिकल स्टोर, राशन, सब्जी, ढाबे और अन्य छोटे व्यवसाय बंद हुए तो कई परिवारों की रोजी-रोटी भी संकट में आ गई।
सरकारी घोषणाओं से पेट नहीं भरता—प्रभावितों को अब जमीन पर राहत चाहिए।
बाजार उजड़ा तो आजीविका भी उजड़ी
छेनागाड़ की त्रासदी सिर्फ मकान और दुकानों के ढहने की कहानी नहीं है। यह उन परिवारों की कहानी है जिनकी पूरी अर्थव्यवस्था बाजार के साथ ही ढह गई।
एक साल बाद भी अगर प्रभावित व्यापारी अपने पुराने कारोबार को खड़ा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तो सवाल उठना लाजिमी है कि आपदा के बाद पुनर्वास की सरकारी मशीनरी ने आखिर क्या किया?
बदहाल सड़क ने खोल दी विकास के दावों की पोल
बाजार को दोबारा बसाने के लिए सुरक्षित सड़क और बेहतर संपर्क सबसे जरूरी है, लेकिन सड़क की बदहाली ने लोगों की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब तक आवाजाही सुरक्षित नहीं होगी, तब तक उजड़े बाजार में व्यापार की रौनक लौटाना मुश्किल है।
एक तरफ विकास के दावे, दूसरी तरफ छेनागाड़ की बदहाल तस्वीर—फर्क साफ दिखाई दे रहा है।
अब सवाल जनता के हैं, जवाब सरकार को देना होगा
आपदा की बरसी पर प्रभावित परिवारों के सामने सिर्फ पुरानी यादें नहीं, बल्कि कई अनसुलझे सवाल हैं—
एक साल में छेनागाड़ का बाजार क्यों नहीं बस पाया?
प्रभावित परिवारों को उनका पूरा हक कब मिलेगा?
मुआवजे और पुनर्वास की प्रक्रिया कहां तक पहुंची?
उजड़े व्यापारियों की आजीविका वापस लाने की योजना क्या है?
बदहाल सड़क कब सुधरेगी?
अब प्रभावितों को नई घोषणा नहीं, घोषणाओं का हिसाब चाहिए।
छेनागाड़ पूछ रहा है—आपदा हमने झेली, वादे आपने किए, फिर एक साल बाद भी हम इंतजार क्यों कर रहे हैं?
प्राकृतिक आपदा ने छेनागाड़ को एक बार उजाड़ा था। लेकिन अगर राहत, पुनर्वास और पुनर्निर्माण में देरी जारी रही तो सरकारी व्यवस्था की बेरुखी प्रभावितों के जख्म और गहरे कर सकती है।
अब वक्त है कि सरकार छेनागाड़ की फाइलों से बाहर निकलकर
जमीन पर काम दिखाए,ताकि मलबे में दबी बाजार की रौनक और प्रभावित परिवारों की जिंदगी फिर से पटरी पर लौट सके।


