स्थानीय पत्थर और पारंपरिक निर्माण शैली को बढ़ावा देने की जरूरत : मनोज रावत
रुद्रप्रयाग। पूर्व विधायक केदारनाथ मनोज रावत ने उत्तराखंड में स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक निर्माण शैली के उपयोग को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा है कि केदारनाथ पुनर्निर्माण के दौरान स्थानीय पत्थरों के उपयोग की पहल उनके राजनीतिक जीवन के सबसे संतोषजनक कार्यों में से एक रही है।
मनोज रावत ने कहा कि नेपाल में पत्थर और लकड़ी से बनने वाले पारंपरिक घरों के निर्माण पर लगातार काम हो रहा है। वहां आधुनिक मशीनों की मदद से पत्थरों को काटकर ईंटों के स्वरूप में तैयार किया जा रहा है और स्थानीय निर्माण शैली को नई तकनीक के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है। इसके विपरीत उत्तराखंड में स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक वास्तुकला के संरक्षण को लेकर अपेक्षित प्रयास नहीं हो पाए हैं।
उन्होंने कहा कि विधायक रहते हुए उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को केदारनाथ पुनर्निर्माण में स्थानीय पत्थरों के अधिकतम उपयोग का सुझाव दिया था, जिसके बाद अधिकारियों को इस दिशा में कार्य करने के निर्देश दिए गए। उन्होंने बताया कि केदारनाथ धाम के पटांगण में स्थानीय पत्थरों के उपयोग की अवधारणा को जमीन पर उतारने के लिए मशीन उपलब्ध कराने तथा तकनीकी सहायता दिलाने का कार्य भी किया गया। इस कार्य में बसुकेदार क्षेत्र के जगदीश का महत्वपूर्ण योगदान रहा, जिनकी तकनीकी समझ और मेहनत से स्थानीय पत्थरों के उपयोग की दिशा में नई शुरुआत हुई।
मनोज रावत ने कहा कि विधायक निधि से बसुकेदार-बड़ेथ क्षेत्र में पत्थर काटने की मशीन स्थापित कराई गई थी, जिससे केदारनाथ चौक के लिए पत्थर तैयार किए गए। बाद में सोनप्रयाग और केदारनाथ में भी बड़े पत्थर कटर लगाए गए। उन्होंने कहा कि भले ही जगदीश का नाम सार्वजनिक रूप से अधिक लोगों को ज्ञात न हो, लेकिन केदारनाथ पुनर्निर्माण में उनका योगदान महत्वपूर्ण रहा है।
पूर्व विधायक ने खेद व्यक्त करते हुए कहा कि केदारनाथ से शुरू हुई स्थानीय पत्थरों के उपयोग की मुहिम आगे नहीं बढ़ सकी। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि गैरसैंण स्थित विधानसभा भवन परिसर में स्थानीय पत्थरों के स्थान पर बाहर से मंगाई गई सामग्री का उपयोग किया जा रहा है, जबकि चांदपुर गढ़ी जैसे ऐतिहासिक निर्माण स्थानीय पत्थरों की उत्कृष्टता के प्रमाण हैं।
उन्होंने कहा कि आज "जय पहाड़, जय पहाड़ी" के नारे तो खूब लगाए जाते हैं, लेकिन पहाड़ की संस्कृति, पारंपरिक भवन निर्माण शैली और स्थानीय संसाधनों के संरक्षण को लेकर गंभीर चर्चा बहुत कम दिखाई देती है। यदि स्थानीय निर्माण सामग्री और तकनीक को बढ़ावा दिया जाए तो न केवल पहाड़ की सांस्कृतिक पहचान सुरक्षित रहेगी, बल्कि स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
मनोज रावत ने कहा कि उत्तराखंड को अपनी पारंपरिक निर्माण शैली, स्थानीय पत्थरों और पहाड़ी वास्तुकला को आधुनिक तकनीक के साथ जोड़कर आगे बढ़ाना होगा। तभी विकास और सांस्कृतिक संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकेगा।


